
रांची, 2 अगस्त। विज्ञान और तकनीक के इस आधुनिक दौर में फिंगर प्रिंट (अंगुलियों के निशान) अपराध जांच और पहचान सत्यापन की सबसे विश्वसनीय विधियों में से एक माना जाता है। विश्वभर की पुलिस और फॉरेंसिक एजेंसियां हत्या, डकैती, चोरी और अन्य गंभीर अपराधों की जांच में फिंगर प्रिंट तकनीक का प्रभावी उपयोग करती हैं। अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें वर्षों से अनसुलझे अपराधों का खुलासा केवल फिंगर प्रिंट के आधार पर संभव हो सका।


फिंगर प्रिंट के वैज्ञानिक उपयोग की शुरुआत वर्ष 1858 में हुई थी। ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) के अधिकारी सर विलियम जेम्स हर्शेल ने तत्कालीन बंगाल के हुगली जिले में पहचान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पहली बार किसी व्यक्ति की हथेली और अंगुलियों के निशान दर्ज किए थे। उन्होंने एक स्थानीय ठेकेदार के साथ अनुबंध के दौरान यह प्रयोग किया, ताकि भविष्य में वह अपने समझौते से मुकर न सके। बाद में उनके अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि प्रत्येक व्यक्ति के फिंगर प्रिंट एक-दूसरे से अलग होते हैं और जीवनभर लगभग अपरिवर्तित रहते हैं।



हर्शेल के इस प्रयोग ने आधुनिक पहचान प्रणाली और फॉरेंसिक विज्ञान की मजबूत नींव रखी। समय के साथ फिंगर प्रिंट तकनीक का उपयोग अपराध जांच, न्यायिक प्रक्रिया, सरकारी अभिलेखों, पासपोर्ट, बैंकिंग सेवाओं और विभिन्न पहचान प्रणालियों में व्यापक रूप से होने लगा। आज यह तकनीक विश्वसनीय पहचान के सबसे प्रभावी माध्यमों में गिनी जाती है।
भारत में भी फिंगर प्रिंट का महत्व लगातार बढ़ा है। आधार प्रणाली में प्रत्येक नागरिक की विशिष्ट पहचान सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक डेटा, विशेष रूप से अंगूठे और उंगलियों के निशानों का उपयोग किया जाता है। इसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जाती है, जिससे सरकारी और वित्तीय सेवाओं में पहचान का सत्यापन आसान और सुरक्षित बनता है।
अपराध जांच में भी फिंगर प्रिंट की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। पुलिस विभाग अपराधियों के फिंगर प्रिंट का रिकॉर्ड सुरक्षित रखता है, जिससे घटनास्थल से मिले निशानों का मिलान कर संदिग्धों की पहचान की जा सकती है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के बाद जांच प्रक्रिया में फिंगर प्रिंट, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी को विशेष महत्व दिया गया है। अब अनुसंधान अधिकारियों के लिए घटनास्थल से वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र करना जांच का अनिवार्य हिस्सा बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों के विकास के बावजूद फिंगर प्रिंट आज भी अपराधियों तक पहुंचने और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने का सबसे विश्वसनीय और प्रभावी वैज्ञानिक साक्ष्य बना हुआ है।


