
जब ढोलक की थाप थम गई……
जमशेदपुर की एक रात अचानक बहुत शांत हो गई। मंगलवार की देर रात टाटा मुख्य अस्पताल के सीसीयू में लेटे एक कलाकार की सांसें धीरे-धीरे थम गईं… और उसी के साथ थम गई वह थाप, जिस पर न जाने कितने भजन, ग़ज़ल और सुरों की महफ़िलें सजी थीं।


ढोलक के जादूगर रमेश दास अब इस दुनिया में नहीं रहे।

करीब डेढ़ साल से वे एक कठिन लड़ाई लड़ रहे थे — कैंसर से। शरीर जवाब दे रहा था, लिवर और फेफड़ों में पानी भर गया था, लेकिन मन शायद अब भी किसी मंच पर था… जहां रोशनी हो, सामने श्रोता हों और उनकी ढोलक की संगत पर कोई गायक सुर साध रहा हो।



रमेश दास कोई साधारण कलाकार नहीं थे। वे उन फनकारों में थे जो मंच के बीच में नहीं, किनारे बैठकर पूरी महफ़िल की जान बन जाते हैं। उनकी उंगलियाँ जब ढोलक पर चलती थीं तो सिर्फ ताल नहीं निकलती थी — एहसास निकलता था।
उन्होंने **लखबीर सिंह लक्खा** जैसे प्रसिद्ध भजन गायक से लेकर देश के कई ग़ज़ल और भजन गायकों के साथ संगत की। बड़े मंच हों या स्थानीय कार्यक्रम — उनकी थाप हर जगह एक जैसी सच्ची रही।
संगीत उनके लिए पेशा नहीं, साधना था।
दिन में वे **टाटा स्टील** के कर्मचारी थे, जिम्मेदारियों से भरी जिंदगी जीते हुए। बाद में उन्होंने ईएसएस लिया, मगर असली पहचान तो वही रही — ढोलक लिए मंच पर बैठे रमेश दास।
और शायद संगीत ही उनकी सबसे बड़ी विरासत बनकर आगे बढ़ा — उनकी बेटी **श्रद्धा रमेश दास** के रूप में। जिन्हें लोग प्यार से *“सुरों की राजकुमारी”* कहते हैं। फिल्मों में पार्श्व गायन करने वाली श्रद्धा की आवाज़ में कहीं न कहीं पिता की वही लय, वही संस्कार सुनाई देते हैं।

बुधवार की सुबह जब उनके निधन की खबर फैली, तो उनके घर का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ — लोग आते रहे, यादें सुनाते रहे, आंखें नम होती रहीं।
गुरुवार सुबह 10 बजे, **अनिल सुर पथ, नाना-नानी पार्क के पास स्थित उनके आवास** से उनकी अंतिम यात्रा निकली। ढोलक खामोश थी… मगर माहौल में जैसे उसकी गूंज अब भी तैर रही थी।
पार्वती घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ।
कहते हैं कलाकार कभी जाते नहीं —वे अपनी कला में बस जाते हैं।
रमेश दास भी अब हर उस भजन की थाप में जिंदा रहेंगे, जहां ढोलक दिल की धड़कन बनकर बजती है


