
*सरायकेला:* शादी के सीजन में शादी समारोह को भव्य रूप देने के लिए हर समाज के हर वर्ग के लोगों को एडी छोटी एक करते देखा गया। वहीं आज के आधुनिक युग में भी गौड़ समाज के युवा पीढी को शादी के दौरान “कौड़ी खेल” की रस्म बखूबी निभाते देखा गया। स सरायकेला प्रखण्ड अन्तर्गत मुरुप गाँव के एक शादी समारोह मेशामिल हुए गौड़ सेवा संघ के केंद्रीय उपाध्यक्ष हेमसागर प्रधान ने बताया कि शादी में ‘कौड़ी खेल’ की परंपरा गौड़ समाज की पहचान है। यह खेल जुआ नहीं, शगुन है। परिवार में हंसी-खुशी का माहौल बनाता है। रिश्ते में प्यार और लक्ष्मी लाने की कामना करते है। कौड़ी को भाग्य, समृद्धि और सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है।


*रस्म कैसे होती है:*



शादी के बाद या विदाई से पहले दूल्हा-दुल्हन को आमने-सामने बिठाया जाता है। दुल्हन अपनी मुट्ठी में एक छोटी कौड़ी छिपाती है। दूल्हे को अपनी छोटी उंगली से मुट्ठी खोलकर कौड़ी निकालनी होती है। फिर दूल्हा मुट्ठी बंद करता है और दुल्हन उसे खोलने की कोशिश करती है।
*हार-जीत का पाठ:* मान्यता है कि जो जीतेगा उसका वैवाहिक जीवन में वर्चस्व रहेगा। असल में ये सिखाता है कि जिंदगी में हार-जीत मिलकर निभानी है।
*समृद्धि का शगुन:* कौड़ी पुरानी मुद्रा थी। खेल का मतलब घर में लक्ष्मी का आगमन।
*मेल-मिलाप:* भाभी-ननद और दोस्तों की हंसी-मजाक से नई दुल्हन का संकोच टूटता है। रिश्ते में झिझक कम होती है।
*विश्वास और समझ:* यह खेल दूल्हा-दुल्हन के बीच विश्वास और समझ का प्रतीक है।


